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Tuesday, June 18, 2013

मौसम बड़ा भ्रष्ट है

इसी बात का कष्ट है
यहाँ सब कुछ स्पष्ट है
एक कोने मे सूखा-गर्मी
दूसरी जगह सब त्रस्त है
मौसम बड़ा भ्रष्ट है। 

कहीं बाढ़ की रार मची है
कहीं  रिमझिम की तान छिड़ी है
कोई भीगता भीगता हँसता
कोई भागता भागता रोता
दिन रात के सुकून को खोता।

उस समय को क्यों नहीं सोचा
जब हरियाली को है नोंचा
जैसा किया अब भोगो वैसा
नियम प्रकृति का स्पष्ट है
वो तो अपने ही में मस्त है।

रिश्वत संकल्प की चाहता मौसम
नंगे पहाड़ों का पेड़ ही वस्त्र हैं
मत उजाड़ो सुंदर धरती 
झरने नदियां हम से त्रस्त हैं
मौसम नहीं हम ही भ्रष्ट हैं ।

~यशवन्त माथुर©

Monday, June 17, 2013

कल रात आसमान में चाँद नहीं दिखा।

कल रात
आसमान में चाँद नहीं दिखा
मानसूनी बादलों को ओढ़े
जाने कहाँ छिपा रहा

मैं ताकता रहा राह
कि अगर दिख जाय तो
तारों की थाली में
परोस दूंगा कुछ बातें

न आया वो
न हो पायी मुलाक़ात
कड़कती रही बिजली
होती रही बरसात
 
वो किसी गम में है
या किसी और से मिलता रहा
कल रात आसमान में
चाँद नहीं दिखा।

~यशवन्त माथुर©

Sunday, June 16, 2013

मैं चुप नहीं रह सकता ...

न जाने कैसे
कुछ लोग
ओढ़े रहते हैं
मौन का आवरण
कोलाहल में भी
बने रहते हैं शांत
रुके हुए पानी की तरह

मैंने कोशिश की कई बार
उन जैसा बनने की
शांति और सन्नाटों को
महसूस करने की 

पर अफसोस!
मैं पानी की बहती धार हूँ
जो बक बक करती जाती है
अपनी कल कल में
अपनी धुन में
इस बात से बे परवाह
कि कोई सुन रहा है
या नहीं

मैं ऐसा ही हूँ
मौन और मेरा
छत्तीस का रिश्ता है
मौन आकर्षित कर सकता है
मगर मैं
निर्जीव दीवारों से भी
कह सकता हूँ
अपने मन की हर बात
क्योंकि
मैं चुप नहीं रह सकता। 

~यशवन्त माथुर©

Friday, June 14, 2013

मुझे याद है ....

मुझे याद हैं
सन्न कर देने वाले
वह पल
जब  सुनते ही
'तार' का नाम
छा जाती थी
अजब सी खामोशी
छलक पड़ती थीं आँखें
कभी खुशी में
कभी गम में ।
मुझे याद हैं 
त्योहारों पर
भेजे जाने वाले
एक लाइना संदेश ...
लैटर हेड्स पर लिखा
'तार' का पता। 
मुझे याद है
वह पल
जब पहली बार सुना था
'तार' का नाम
बचपन में
और चौंक कर देखा था
धातु के एक तार को
बाल सुलभ
उत्सुकता से ।
वह 'तार'....
बेतार का 'तार'
अब हो जाएगा विदा
हमेशा के लिये
बना कर
साक्षी मुझ को
एक युग के
दूसरे  युग मे
संक्रमण का।
सोच रहा हूँ
'यश' का अंत
इसी तरह होता है
समय यूं ही
चलता है
अपनी तेज़ चाल......। 
  
~यशवन्त माथुर©
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